शनि कृपा प्राप्ति उपाय

शनिदेव ग्रह हर समय पाँच राशियों पर अपना प्रभाव रखते हैं इनमें से तीन राशियों पर साढेसाती के रूप में और दो राशियों पर ढैय्या के रूप में|  प्रत्येक मनुष्य के जीवन में दो से तीन बार साढ़ेसाती और ढय्या अवश्य आती है| हमारी संस्था द्वारा सभी के लिए शनि देव की प्रसन्नता हेतु एक उपाय का निर्माण किया गया है, यह उपाय कई वर्षों की खोज, अध्ययन व संस्था के अनुभवी ज्योतिषाचार्यों द्वारा निर्मित है| यह उपाय शनि देव की पूजा में प्रयोग सामग्री द्वारा विधिसम्मत प्रथाओं पर आधारित है| शनिदेव सभी मनुष्यों को न्यायाधीश के रूप में उनके कर्मों का फल प्रदान करते हैं| इस उपाय के द्वारा हम उचित उपकरण (सामग्री) और विधि के साथ शनि देव को प्रसन्न कर सकते हैं| इस उपाय व विधि द्वारा हम शनि देव की दया व आशीर्वाद प्राप्त करते हैं और उनके प्रकोप के प्रभाव से बच सकते हैं एवं जिन जातकों के लिए कुंडली में शनि देव की स्थिति शुभ है उन्हें शनि देव की पूर्ण कृपा प्राप्त होती है| अपने जीवन में हमें इस उपाय का प्रयोग एक बार अवश्य करना चाहिए|

शनि कृपा प्राप्ति उपाय बहुत ही सरल, व्यावहारिक और कारगर विधि के रुप में बनाया गया है| जिसे हम बिना शंका प्रयोग में ला सकते हैं| हमारी संस्था शनि देव कृपा प्राप्ति उपाय में पवित्र एवं अति दुर्लभ सामग्रियों को अभिमंत्रित करके ही प्रयोग में लाती है|

शीघ्र ही आप इस उपाय द्वारा शनि देव को प्रसन्न करके अपने जीवन को लाभान्वित करेंगे|

शनि की साडे साती क्या है?

शनि ग्रह के सम्बन्ध में अनेक भ्रांतियां है| इसलिए उसे अशुभ, मारक एवम् दुःख कारक माना जाता है| परन्तु सत्य तो यह है कि शनि प्रकृति में संतुलन पैदा करता है और हर प्राणी के साथ न्याय करता है| अनुचित कर्म करने वालों को ही शनि प्रताड़ित करता है| ज्योतिष शास्त्र के अनुसार 30 वर्षके बाद साडे-साती आती है, जब गोचर का शनि जन्म राशि से बारहवें, जन्म राशि में, तथा जन्म राशि से द्वितीय भाव में भ्रमण करता है तो साडे साती मानी जाती है|

मान्यताओं के अनुसार शनि की साडे साती का प्रथम चरण शारीरिक कष्ट को दिखाता है, द्वितीय चरण आर्थिक परेशानी जबकि तृतीय चरण को सम माना जाता है| जिनकी कुंडली में शनि योग कारक होता है उनके लिए शनि की साडे साती अत्यधिक कष्टकारी नहीं होती|

शनि की ढैय्या क्या है?

जब शनि देव चन्द्र कुंडली अर्थात जन्म राशि के अनुसार चतुर्थ तथा अष्टम भाव से गोचर करते हैं तो शनि की ढैय्या मानी जाती है| चतुर्थ भाव से शनि छठे भाव, दशम भाव एवम् लग्न पर दृष्टि रखते हैं जिसके फलस्वरूप जातक के निजकृत पूर्व के अशुभ कर्मों के अनुसार उस के भौतिक सुखों यानी मकान एवम् वाहन आदि में परेशानी पैदा होती है| परेशानियों के बढ़ने से जातक को शारिरिक कष्ट की भी प्राप्ति होती है| इसी प्रकार अष्टम भाव से शनि दशम भाव को, द्वितीय भाव को और पंचम भाव को देखता है| अष्टम ढैय्या में जातक को संतान कष्ट, आर्थिक ढैय्या व पारिवारिक कलह का सामना करना पड़ता है|

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